ईगराह गाँव पंचायत
राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली के पश्चिम में जीन्द भिवानी रोड पर बसा गांव ईगराह जिला जीन्द की सीमा का अंतिम गांव है। जींद से 18 कि0मी0 की दूरी पर हरे भरे वृक्षों से घिरा हुआ गांव हैं। जनगणना 2011 के अनुसार गांव की कुल जनसंख्या लगभग 8,000 है। इस गांव का इतिहास गौरवपूर्ण है। सन् 1947 से पहले ईगराह गांव राजा जीन्द की रियासत में था और इसका अंतिम राजा राजबीर सिंह हुआ था। जिला संगरूर था। सन् 1966 ई0 में हरियाणा भारत के नक्शे पर अस्तित्व में आया , तब ईगराह गांव का जिला जीन्द बना।
ईगराह गांव में जो थेह (टीला) है वह हड़प्पा काल व कुषाण काल से संबंधित हैं वर्तमान में इस थेह पर श्री भावानंदी आश्रम है। यह थेह हड़प्पा काल का है और इसी के साथ जो दूसरा थेह है, यह कुषाण काल से संबंधित माना जाता है। इतिहासविद् श्री गुलशन कुमार भारद्वाज ने बताया है कि यहां जो अवशेष (मनके, बर्तन, सिक्के ) मिलते है वो हडप्पा व कुषाण काल से सम्बंधित है आज से लगभग 5000 हजार वर्ष पूर्व यहां से दृश्दवति नदी बहती थी। प्राचीन काल में नदियों के किनारे पर बस्तियां व नगर विकसित हुए। राखीगढ़ी इस क्षेत्र का एक बड़ा विकसित नगर था।
गाँव का इतिहास
1723 विक्रम समवंत में माघ मास की पूर्णिमा में अम्मू जी इस गाँव में आए थे| वो पहले व्यक्ति थे जो इस गाँव में आए| उनके साथ उन के 5 पुत्र भी आए| जिनमें से एक का नाम दददू था| इन्होने ही इस गाँव की स्थापना की| उस से पहले ये महाराजा ग्याद की नगरी थी| जो की कुछ समय बाद उजड़ गई थी| जिसके दडे (गरक हुई ज़मीन) पर अम्मू जी ने इस गाँव को बसाया| गाँव में एक 158 साल पुराना कुँआ है जिसमें अभी भी पानी है, जिसके पानी को आज भी पीने में इस्तेमाल किया जाता है| गाँव में दो पाने हैं, जिनके नाम छोटा व बड़ा पाना है| गाँव में कई जातियों में बहुतायत जाटों की जिसमे अधिकतर रेढ़ु गोत्र के लोग है| इसके अलावा गाँव में जाटों के कई गोत्र जैसे नरवाल, बांबल, सहरावत हैं| गाँव में और कई जातियों जैसे ब्राह्मण, गोस्वामी, खाती, मनियार, कुम्हार, बाल्मिकी, हरिजन, नाई, तेलि, और मीरासी हैं|







